दीया बाती ( भोजपुरी, तिमाही, ई - पत्रिका )

अनगढ़ हीरा

"भिखारी ठाकुर जी के पुण्य तिथि, 10 जुलाई प विशेष"

आशीष त्रिवेदी

7/7/20251 min read

अनगढ़ हीरा

कला, कला खातिर ना बलुक जीवन के खूबसूरत बनावे खातिर ह । अपना कला के माध्यम से कलाकार समाज के कवनो दिशा नइखे देत, समाज के आगे बढ़ावे में कवनो योगदान नइखे करत त ओह कला के कवनो मतलब नइखे । ऊ खाली नाच - गाना तक सीमित रहि जाले । कला के सामाजिक सरोकार होखे के चाहीं । अइसने सामाजिक सरोकार से जुड़ल भोजपुरी के एगो कलाकार रहले भिखारी ठाकुर । जिनका के सही मायना में सांस्कृतिक योद्धा कहल जा सकेला ।

भिखारी ठाकुर जी गीतन आ नाटकन के जरिये समाज में घटित हो रहल आ बाद में घटित होखे वाला घटनन के बारे में जवन चित्रण कइले बानी ऊ ना खाली समाजिक सरोकार से जुड़ल बाकी ऊ सामाजिक आंदोलन के एगो हथियार बनि गइल ।

कुतुबपुर ( सारण, बिहार ) के दलसिंगार ठाकुर आ शिवकली देवी के बेटा भिखारी ठाकुर के जन्म 18 दिसंबर, 1886 ई0 के भइल रहे । किताबी ज्ञान ना के बराबर । कुछ दिन तक पारिवारिक पेशा में रहलन । बाबू जी के संगे गांव के लोगन के हजामत बनवलन । पहिले गांव के ठाकुरे लोग नेवता बांटे के काम करत रहे । ऊहो एह काम में लाग गइलन । परिवार खुश रहे कि घर के सवांग आपन जातिगत पेशा में लाग गइल बाड़न । बाकिर उनका पढ़े ना आवत रहे, जेकर से उनका नेवता बांटे में बहुत दिक्कत होखे । ऊ दोसरा केहू से नाम - पता पढ़ा के नेवता बांटत रहस । एहसे नेवता बांटे में कबो - कभार गलतियो हो जात रहे । दोसरा से बेर - बेर नेवतहरिन के नाम - पता पढ़ा - पढ़ा के नेवता बांटल उनका बाउर लागे । पढ़ल - लिखल ना रहला के कमी भिखारी ठाकुर के मन के कचोटे लागल । लड़िकाईं में देर से स्कूल गइला आ उहंवा जाके पढ़ ना पइला के दुख से मन में धक्का लागल । ओकरा बाद उनका मन में अच्छर - ज्ञान अर्जित करे के लालसा जागल । बाकिर पढ़े खातिर अब स्कूल गइल संभव ना रहे । मन में इहो भाव रहे कि अब स्कूल गइला पर लोग का कही ! बाकिर अच्छर - ज्ञान पावे के ललक उनका मन में रचि बस गइल रहे । एह काम खातिर ऊ गांवे में एगो गुरु खोज लेहलन । गांव में एगो बनिआ रहस, जेकर नाम भगवान रहे । भिखारी ठाकुर उनका लगे बइठत रहस । उनके के गुरु बना के ऊ ककहरा सिखलन आ चिट्ठी - पतरी बांचे लगलन । भगवान बनिआ के संगत उनका जिनिगी के एगो बहुत बड़ा संजोग साबित भइल । गांव में हजामत बना के टिपटाप में रहे वाला बहुत कम लोग रहस । जेकरा गांवे में रहे के रहे, ओकरा बढ़ल केस - दाढ़ी के परवाह ना रहे । एह से गांव में गहंकी के कमी रहे । भिखारी ठाकुर कमाये खातिर घर से भाग के खड़गपुर चल गइलन ।

‘‘अलप काल में लीखे लगली, तेकरा बाद खड़गपुर भगलीं ।

ललसा रहे जे बहरा जाईं, छुरा चला के दाम कमाई ।।’’

पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में कुछ दिन रहला के बाद भिखारी ठाकुर मेदनीपुर चल गइलन । दशहरा के बेरा ऊहंवा रामलीला होत रहे । अपना संगतिआ के साथे उहो रामलीला देखे गइलन । रामलीला के पात्रन के अभिनय देख के उनका लागल कि ई काम त उहो कर सकत बाड़न । ओही घड़ी उनका मन में अभिनय के ले के रुझान पैदा भइल । ओकरा बादे उनकर कलाकार बाहर निकल आइल ।

‘‘गइली मेदनीपुर के जीला, ओजिये कुछ देखलीं रामलीला ।

ठाकुर दुअरा उहां से गइली, चनन तालाब समुद्र नहइली ।

दरसन करि डेरा पर आईं, खोलि पोथी देखी चउपाई ।

अरथ पूछि - पूछि के सीखीं,

बौहा छनव निज हाथ से लीखी ।।’’

मेदिनीपुर में रामलीला देख के प्रभावित भइला पर भिखारी ठाकुर वापस अपना गांव चल अइलन। बगल गांव के उनकर एगो मित्र रहस, जिनकर नाम रामानंद सिंह रहे । भिखारी ठाकुर उनके साथे रामलीला खेलल शुरू कइलन । ऊ रामायण प्रसंग पर नाटक प्रस्तुत करे लगलन । बाकी समाज में फइलल जातिगत ढ़कोसला, दुराचार, लालच आ समाज में असंगत बेवहार उनका बड़ा खटकत रहे । जब - जब उनका मोका मिलत रहे, ऊ गीत आ नाटक के माध्यम से समाज में फइलल कुरीतियन के तूड़े के भरपूर कोशिश कइलन ।

कला के कहीं विधिवत प्रशिक्षण ना रहे तबो सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यन के अपना कला के चरम पर ले जाके प्रस्तुत करस ।‌ धीरे - धीरे उनकर कार्यक्रम में खूब भीड़ जुटे लागल आ लोग उनका के एगो लोक कलाकार के रूप में पहचाने लगलन ।

‘‘निजपुर में करिके रामलीला, नाच के तब बन्हली सिलसिला ।

तीस बरिस के उमिर भइल, बेधलसि तब कलिकाल के मइल ।

नाच मंडली के धरि साचा, लेकचर दीहीं कहि रघुनाथा ।

बरजत रहलन बाप - मतारी, नाच में तू मति रह भिखारी ।

चुपके भाग के नाच में जाई, बात बना के दाम कमाईं ।’’

समाज में फइलल कुरीतिअन, बुराई, जाति - पात, ऊंच - नीच, पारिवारिक रिश्ता के बाजारूपन आ पारिवारिक विघटन, अंधविश्वास, महिला उत्पीड़न, बाल विवाह के विकृत रूप के भिखारी ठाकुर अपना गीतन आ नाटकन के जरिये समाज के सामने उजागर कइलन । उहां के समाज के रीति - रिवाज, उतार - चढ़ाव, भेद - भाव, चाल - चलन के बड़ा साफ चित्रण कइले बानी । उनकर प्रस्तुति में उठावल गइल सामाजिक समस्या कमोबेस आजो समाज में बरकरार बा ।‌

सैकड़ों गीतन‌ आ एक दर्जन से अधिक नाटकन के रचना करे वाला भिखारी ठाकुर अपना जीवन काल में ही किंवदंती ब‌न गइल रहनी ।‌

भिखारी ठाकुर के रचना बिदेसिया खूब चर्चित भइल ।‌ गांव - जवार से कमाये खातिर परदेस चल गइल युवक के पलायन के दर्द आ परदेस गइला पर मेहरारू के का हाल हो जाला, एकर वर्णन उहां के आपन ष्बिदेसियाष् नाटक में कइले बानी ।

परदेश गइला पर अइसन ना होखत रहे कि उहवां जाते - जाते भरपूर कमाई कइके लोग मालामाल हो जाए । लोग आपन हित - मित्र के साथे जात रहस आ उनके किरपा आ संगत से कुछ दिन में कहंई कवनो काम मिल जात रहे । मरद आपन पेट पालत आ पईसा - पईसा जोड़त ढेर दिन ले घरे ना आवत रहस । एने मेहरारू बियोग में रहे लागत रहे ।

‘‘करि के गइलन बलमुआं निरासा,

गवना करा के संइया घरे छोड़ि दिहलन,

गइलन बिदेस हमके करि के बेकासा ।’’

बिआह के बाद कुछ दिन लोग घरे रह पावत रहे । जिम्मेदारी बढ़ते लोग कमाये खातिर परदेस चल जात रहे । परदेस श्गइल मरद के नया मेहरारू के मन में तरह - तरह के भाव उठेला ।

"गवना कराई सैंया घर बइठवले से, अपने लोभइले परदेस रे बिदेसिया ।

चढ़ती जवनिया बैरन भइली हमरी से, के मोरा हरिहें कलेस रे बिदेसिया ।।’’

’’कहत भिखारी नाई आस नइखे एको पाई।

हमरा से होखे के दीदार हो बलमुआ ।।

( बिदेसिया ) नाटक के धूम देशे ना, विदेशों में भइल । उनकर ‘बिदेसिया’ नाटक भोजपुरी भाषा खातिर एगो बड़हन धरोहर हो गइल बा ।

बिदेसिया के अलावा उहां के चर्चित नाटक बेटी बियोग आ गबरघिचोर भइल ।‌ बेटी बियोग में जहां कम उम्र में लड़किन के शादी के बहाने समाज के सामने एगो मिसाल प्रस्तुत कइनी । इ नाटक सामाजिक बदलाव में आपन बहुत बड़ योगदान दिहलस । गबरघिचोर अपना समय से बहुत आगे के नाटक बा । एह में स्त्री के कोख पर अधिकार के सवाल उठावल गइल बा ।

बिना पूरा शिक्षा पवले विशुद्ध भोजपुरी भाषा में भिखारी ठाकुर जवन लिखलन, गवलन आ मंच पर उतार देहलन, ऊ भोजपुरी भाषा आ लोकरंग के इतिहास में एगो बड़हन उपलब्धि के रूप में अंकित भ गइल बा । भोजपुरी भाषा में देहल उनकर उपलब्धि देश से बाहर विदेशों में फइल चुकल बा । भिखारी ठाकुर समाज के अकुश से बिना डेरइले खुल के लिखलन, खूब निभवलन । अपने अनपढ़ होके प्रस्तुति के ऊ अनगढ़ ना होखे दिहलन । इहे अंदर के कलाकारी ह जवन उनका में कूट - कूट के भरल रहे । महा पंडित राहुल सांकृत्यायन जी उहां के भोजपुरी के एगो अनगढ़ हीरा कहनी ।

आशीष त्रिवेदी

सचिव

संकल्प साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थान, बलिया

सचल दूरभाष - 9918377816

[ दीया बाती के समहुतांक ( जुलाई, 2025 ) के अंक में प्रकाशित रचना । ]